काठमाडौं । राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग विवादित ‘जेनजी आंदोलन’ घटना पर आधारित अध्ययन प्रतिवेदन के अंग्रेजी में अनुवाद क के जेनेभा स्थित संयुक्त राष्ट्रसंघीय मानव अधिकार उच्चायोग के कार्यालय में भेज दिहले बा।
नेपाल के भीतर ही प्रतिवेदन सार्वजनिक करे के चारो ओर से मांग होत रहल आ सरकार द्वारा कार्रवाई प्रक्रिया आगे ना बढ़ावल जा रहल हालत में आयोग एह प्रतिवेदन के अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचवले बा।
अंतरराष्ट्रीय जिज्ञासा आ आयोग के कदम
आयोग के सदस्य मिहिर ठाकुर आ उपसचिव माया शर्मा अभी जेनेभा में मौजूद बाड़ें। नेपाल सरकार द्वारा प्रतिवेदन लागू करे में देखावल उदासीनता आ ‘तू चुप, हम चुप’ जइसन स्थिति से असंतुष्ट होके आयोग अंतरराष्ट्रीय मंच के माध्यम से दबाव बनावे के कोशिश करत बा, स्रोत के दावा बा। आयोग के एगो अधिकारी कहलें, “हमनी कई बेर एह के सार्वजनिक करे के अनुरोध कइनी, लेकिन सुनवाई ना भइल। अब जेनेभा से कुछ परिणाम निकले के उम्मीद बा।”
के-के पर कार्रवाई के सिफारिस?
भदौ २३ आ २४ के आंदोलन घटना पर आधारित एह प्रतिवेदन में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, गृहमंत्री रमेश लेखक आ आईजीपी चन्द्रकुवेर खापुङ पर फौजदारी कसूर में जांच आगे बढ़ावे के सिफारिस कइल गइल बा।
एह के अलावा, विध्वंसकारी गतिविधि में शामिल रहे के तथ्य मिलला पर कलाकार, पत्रकार आ सोशल मीडिया से जुड़ल प्रभावशाली व्यक्ति लोग के भी कार्रवाई के दायरा में लावे के निर्देश दिहल गइल रहे। करीब १० हजार पन्ना के एह लंबा प्रतिवेदन के कुछ हिस्सा ही सार्वजनिक होखला पर आयोग के आलोचना भी भइल रहे।
ओली, लेखक आ गुरुङ के निवेदन
एह बीच, प्रतिवेदन में नाम जुड़ल तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली, पूर्व गृहमंत्री लेखक आ मंत्री पृथ्वीसुब्बा गुरुङ आयोग में आवेदन देके प्रतिवेदन के वैधानिकता पर सवाल उठवले बाड़ें।
उहाँ लोग आयोग के फैसला, बयान आ जरूरी दस्तावेज सहित पूरा प्रति मांगे बाड़ें। हालांकि, आयोग अबले सुप्रीम कोर्ट या सरकार के छोड़ के दोसरा के एह प्रतिवेदन देवे से इनकार करत आइल बा।

