काठमांडू । प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार के सौ दिन पूरा हो गइल बा। नेपाल के राजनीतिक इतिहास में पहिलका बेर मधेसी समुदाय के व्यापक समर्थन आ प्रतिनिधि सभा में १८२ सीट के साफ बहुमत से बनल ई सरकार से शुरू में मधेस में काफी उम्मीद आ उत्साह रहल। बाकिर सौ दिन के भीतर ही ई उत्साह धीरे-धीरे असंतोष में बदलत देखाइल दे रहल बा। मधेस के राजनीतिक विश्लेषक, बुद्धिजीवी, खुदे पार्टी के सांसद आ मधेस केन्द्रित दल के नेता लोग सरकार के कामकाज पर सवाल उठावे लागल बा।
फागुन २१ के चुनाव से पहिले प्रधानमंत्री शाह अपना चुनावी अभियान के शुरुआत मधेस से कइले रहलें। ओह दौरान राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के मधेस में प्रत्यक्ष आ समानुपातिक दुनो तरह से बढ़िया समर्थन मिलल रहल। मधेसी समुदाय से प्रधानमंत्री बने वाला पहिला व्यक्ति होखे के कारण मधेस में उनका नेतृत्व से बहुत अपेक्षा रहल, बाकिर अब ओह अपेक्षा में कमी आवत देखाइल दे रहल बा।
अपना सांसदन के असंतोष
मधेस मामलों के जानकार चन्द्रकिशोर के अनुसार असंतोष खाली विपक्ष तक सीमित ना बा, बल्कि रास्वपा के अपना सांसद लोग भी सरकार के कामकाज से नाखुश बाड़े। सांसद अमरेश कुमार सिंह, पुरुषोत्तम यादव आ तपेश्वर यादव खुल के सरकार के आलोचना कर चुकल बाड़े, जबकि मनिष झा भी लगातार असंतोष जतावत बाड़े।
अमरेश कुमार सिंह कहले बाड़े कि इतिहास में दू तिहाई बहुमत वाली सरकार अक्सर सफल ना भइल बाड़ी, आ एह सरकार के भविष्य पर भी सवाल उठावल जा सकेला। ऊ सरकार पर मधेस के साथ भेदभाव करे के आरोप भी लगवले बाड़े। उधर, पुरुषोत्तम यादव संसद में सरकार के ‘कुंभकर्ण’ कह के आलोचना कइले रहलें आ कहले कि सरकार जनता के आवाज ना सुनत बा।
संघीयता के मुद्दा से बढ़ल दूरी
विश्लेषक विजयकांत कर्ण के अनुसार रास्वपा के महाधिवेशन के बाद सामने आइल नीति दस्तावेज से मधेस में सरकार पर भरोसा कमजोर भइल बा। उनका मुताबिक, पार्टी में मधेसी प्रतिनिधित्व कम देखाइल दे रहल बा आ प्रदेश संरचना के जरूरी ना माने वाला नीति से मधेस में संघीयता पर खतरा के संदेश गइल बा।
उनका कहनाम बा कि मधेस खातिर संघीयता, समावेशिता आ पहचान खाली राजनीतिक मुद्दा ना, बल्कि अस्तित्व से जुड़ल सवाल बा। एह कारण से प्रदेश संरचना के खिलाफ कवनो भी संकेत मधेस में आसानी से स्वीकार ना हो सकेला।
सीमावर्ती नागरिकन के समस्या
विश्लेषक कर्ण बतावत बाड़े कि भारत से १०० रुपया से ज्यादा के सामान लावे पर भंसार (कस्टम) लागे वाला नियम से सीमावर्ती इलाका के लोग पर सीधा असर पड़ल बा। रोजमर्रा के जरूरत के सामान खातिर भारत जाए वाला लोग पर आर्थिक बोझ बढ़ गइल बा, जवन दशकों पुरान सामाजिक आ आर्थिक संबंध पर भी असर डालत बा।
उनका अनुसार हाल के सरकारी नियुक्तियन में भी मधेस के प्रतिनिधित्व कम देखाइल दे रहल बा, एह से खुदे पार्टी के सांसद लोग भी सरकार के खिलाफ बोलत बाड़े।
‘ठगाइल महसूस करत बाड़े मधेसी मतदाता’
लेखक आ विश्लेषक चन्द्रकिशोर के अनुसार चुनाव के समय मधेस के जनता बालेन्द्र शाह पर भरोसा जतवले रहल, बाकिर अब ओह भरोसा में दरार आवत देखाइल दे रहल बा। उनका मुताबिक, मतदाता नया नेतृत्व के मौका देके ‘राजनीतिक जुआ’ खेलले रहलें, बाकिर अब ऊ लोग खुद के ठगाइल महसूस करत बाड़े।
उनका कहनाम बा कि सरकार के निर्णय प्रक्रिया, संगठनात्मक ढांचा आ मधेस के प्रति रवैया से आम जनता में संशय बढ़ रहल बा।
मधेस केन्द्रित दल भी आलोचनात्मक
चुनाव के बाद मधेसी मोर्चा प्रधानमंत्री शाह के शुभकामना देत संविधान संशोधन, संघीयता मजबूत करे, सीमांकन के पुनरावलोकन, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व आ लाल आयोग के रिपोर्ट सार्वजनिक करे के मांग कइले रहल।
बाकिर अब मधेस केन्द्रित दल भी सरकार पर सवाल उठा रहल बा। जनमत पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत आरोप लगवले बाड़े कि सरकार स्वतंत्र ना बा, बल्कि कवनो अदृश्य शक्ति से संचालित हो रहल बा। ऊ सरकार के सुशासन एजेंडा के ‘सस्ता प्रचार’ बतवले बाड़े।
जसपा नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव चेतावनी दिहले बाड़े कि अगर प्रदेश संरचना कमजोर करे के कोशिश भइल, त मधेस में फेर से आंदोलन हो सकेला। उधर, लोसपा के अध्यक्ष महन्थ ठाकुर सरकार के कार्यशैली पर सवाल उठावत कहले बाड़े कि ई देश के अराजकता आ नया द्वंद्व की ओर ले जा सकेला।
‘रास्वपा अबहियों स्पष्ट राजनीतिक दल ना बन पावल’
चन्द्रकिशोर के अनुसार रास्वपा के संगठनात्मक ढांचा में मधेस के प्रभावी उपस्थिति के कमी बा। उनका कहनाम बा कि पार्टी अभी तक साफ वैचारिक आधार पर खड़ा ना हो पावल बा आ अलग-अलग समूह के गठजोड़ जइसन लागेला।
उनका अनुसार सुशासन के नारा देके आइल सरकार प्रदेश व्यवस्था, संसदीय प्रणाली आ संघीय ढांचा पर स्पष्ट रुख ना ले पावत बा, जवन मधेस में निराशा बढ़ावे के कारण बनल बा।
विश्लेषक लोग के मानना बा कि सबसे बड़ा चिंता नेता लोग के बयान ना, बल्कि आम जनता के मन में पैदा होत भावना बा। चुनाव से पहिले बदलाव के उम्मीद में सरकार के समर्थन देवे वाला मतदाता अब धीरे-धीरे ई मान रहल बाड़े कि उनका उम्मीद पूरा ना भइल।
चन्द्रकिशोर के अनुसार उपेन्द्र यादव, महन्थ ठाकुर या सीके राउत का कहत बाड़े, ई से ज्यादा अहम बात ई बा कि मधेस के आम जनता में “हमनी के ठगाइल बानी” के भावना मजबूत होत जा रहल बा, जवन सरकार खातिर सबसे बड़ा चुनौती बन सकेला।

