प्रतिनिधि सभा सदस्य खातिर भइल चुनाव के प्रारम्भिक नतीजा नेपाली राजनीति में ऐतिहासिक आ गहिरा बदलाव के संकेत देले बा। प्रत्यक्ष तरफ के १६५ निर्वाचन क्षेत्र में से राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) लगभग दुई तिहाई के नजदीक तक बढ़त बनवले बा, शुरुआती रिपोर्ट में ई देखाइल बा। समानुपातिक मतगणना के शुरुआती परिणाम भी रास्वपा के पक्ष में मतदाता के उत्साहजनक समर्थन देखल गइल बा।
एह चुनाव के सबसे रोचक बात ई बा कि कई दशक से नेपाली राजनीति में हावी रहल पुरान दलन के शीर्ष नेता खुदे हार के खतरा में पड़ गइल बाड़े। शुरुआती मतगणना से पता चलत बा कि नेकपा के पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ छोड़ के बाकी कई प्रमुख दलन के नेता लोग के जीत मुश्किल होत दिख रहल बा। सुरक्षित क्षेत्र खोजत रुकुम से चुनाव लड़ल प्रचण्ड अपना क्षेत्र में जीत हासिल कर लिहले बाड़ें।
मतगणना जारी रहला के बीच नेकपा एमाले के के.पी. शर्मा ओली, नेपाली कांग्रेस के गगन थापा, राप्रपा के राजेन्द्र लिङदेन, मधेशवादी नेता उपेन्द्र यादव आ सीके राउत जइसन नेता लोग रास्वपा के उम्मीदवारन से काफी पीछे चलत दिख रहल बाड़ें। एहसे साफ संकेत मिलत बा कि मतदाता लोग पुरान राजनीतिक नेतृत्व के कड़ा संदेश दे रहल बा।
दशकन से सत्ता के केंद्र में रहल नेपाली कांग्रेस, एमाले, माओवादी केन्द्र आ मधेशकेन्द्रित दल लोग के एह चुनाव से भारी झटका लागल बा। ई दल अब सिर्फ सीट संख्या में ही ना, बल्कि राजनीतिक प्रभाव आ जनविश्वास में भी कमजोर पड़त नजर आ रहल बाड़ें।
संविधान में व्यवस्था कइल मिश्रित निर्वाचन प्रणाली के बारे में पहिले से बहस होत रहल कि एहसे कवनो दल के स्पष्ट बहुमत मिलल मुश्किल हो जाला। लेकिन शुरुआती परिणाम एह बहस के चुनौती देत दिख रहल बा। रास्वपा अगर एकल बहुमत के तरफ बढ़त रहल, त नेपाल के राजनीतिक शक्ति संतुलन ही बदल सकेला।
कम समय में रास्वपा वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर के सामने आइल बा। २०७९ के प्रतिनिधि सभा चुनाव से पाँच महीना पहिले बनल एह पार्टी तब २१ सीट जीत के चर्चा में आइल रहे। अब तीन साल से भी कम समय में ई चुनाव में असाधारण जनसमर्थन मिलत दिख रहल बा।
विश्लेषक लोग के मुताबिक, एह परिणाम के कारण खाली रास्वपा के उदय ही ना ह। बल्कि बरिसन से सत्ता में होखत ‘म्यूजिकल चेयर’ जइसन सरकार बदलाव, भ्रष्टाचार के आरोप, दण्डहीनता, राज्य संस्था के दलीयकरण आ शासन से बढ़त जननिराशा के चलते पुरान दलन से जनता नाराज हो गइल बा।
एह चुनाव में एगो अउरी महत्त्वपूर्ण पक्ष काठमांडू महानगरपालिका के पूर्व मेयर बालेन्द्र शाह के प्रभाव भी मानल जा रहल बा। साथ ही मधेशी समुदाय में पहिला बेर मधेशी प्रधानमंत्री बन सके के संभावना भी राजनीतिक माहौल में नया रोमांच पैदा कइले बा। एह बदलाव के चाहत से मतदाता नया विकल्प के तरफ आकर्षित भइल बाड़ें।
कुछ विश्लेषक ई भी कहत बाड़ें कि सोशल मीडिया आ सूचना प्रविधि के तेज विस्तार से जनमत निर्माण पर असाधारण प्रभाव पड़ल बा। लेकिन तीन दशक से जादे समय सत्ता में रहल पुरान दलन पर लागल स्वेच्छाचारिता, संस्थागत भ्रष्टाचार आ दण्डहीनता के आरोप के खिलाफ जनता के गुस्सा भी एह चुनाव में साफ दिखाई दे रहल बा।
राजनीतिक विश्लेषक प्रा.डा. लोकराज बराल उज्यालो से बातचीत में कहले, “लंबा समय से सत्ता में रहल कई नेता जनता के अपेक्षा अनुसार काम ना कर सके। स्वार्थ केन्द्रित राजनीति में फँसल नेतृत्व के जनता आखिरकार दण्ड देता। जनमुखी कार्यक्रम, जवाबदेही आ सुशासन ना दे सके वाला नेता लोग के जनता सबक सिखावेला।”
एह तरह शुरुआती नतीजा नेपाली राजनीति में नया शक्ति केंद्र के उदय, पुरान दलन के गिरावट आ मतदाता के बदलत प्राथमिकता के साफ संकेत दे रहल बा। मतगणना पूरा होखला के बाद नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आवे के उम्मीद जतावल जा रहल बा।

