मधेस राजनीति के दिल मानल जाए वाला पर्सा जिला एह बेर नेपाली राजनीति में एगो अविश्वसनीय आ ऐतिहासिक टर्निंग प्वाइंट देले बा ।
२०८२ के प्रतिनिधि सभा सदस्य चुनाव के आखिरी नतीजा आवते साफ हो गइल कि पर्सा के चारों निर्वाचन क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के उम्मीदवार भारी मतान्तर से जीत हासिल कइले बाड़ें । दशकन से पर्सा के राजनीति में दबदबा बनवले पूर्वमंत्री आ स्थापित चेहरा नया शक्ति के सामने कमजोर पड़ गइले ।
निर्वाचन आयोग के अंतिम आंकड़ा अनुसार पर्सा में पुरान दलन के राजनीतिक विरासत खत्म हो गइल बा ।
क्षेत्र नं. १ में रास्वपा के बुद्धिप्रसाद (हरि) पन्त २७ हजार २ सय ७४ मत से निर्वाचित भइले। ऊ नेकपा एमाले के हेवीवेट नेता आ पूर्वमंत्री प्रदीप यादव के दो गुना से ज्यादा मत से हरवले ।
क्षेत्र नं. २ में रास्वपा के सुशील साह कानु ३० हजार ७ सय ४० मत पा के विजयी भइले । उनका नजदीकी प्रतिद्वन्द्वी नेपाली कांग्रेस के नेता अजय कुमार चौरसिया ११ हजार ८ सय ९० मत पर सिमट गइले ।
क्षेत्र नं. ३ में रास्वपा के रामाकान्त प्रसाद चौरसिया २९ हजार ६ सय ७९ मत से जीत दर्ज कइले। ऊ कांग्रेस के पूर्वमंत्री सुरेन्द्र प्रसाद चौधरी के १३ हजार ३ सय १३ मत के भारी अंतर से हरवले ।
क्षेत्र नं. ४ में रास्वपा के टेक बहादुर शाक्य २८ हजार २६ मत से विजयी भइले, जबकि कांग्रेस के पुरान नेता आ पूर्वमंत्री रमेश रिजाल सिर्फ १२ हजार ५ सय ३४ मत ही पा सके।
काहे ढह गइले पर्सा के पुरान ‘स्तम्भ’ ?
पर्सा में प्रदीप यादव, अजय चौरसिया, सुरेन्द्र चौधरी आ रमेश रिजाल जइसन नेता खाली उम्मीदवार ना रहले, बलुक मधेस आ केन्द्र के सत्ता राजनीति के मजबूत चेहरा मानल जात रहे। बाकिर एह बेर उनका हार के पीछे मुख्य तीन कारण देखल जा रहल बा ।
पहिला कारण: सत्ता खातिर लगातार खींचतान आ राजनीतिक अस्थिरता से जनता के बढ़त नाराजगी । दूसर कारण: नया पीढ़ी के नेतृत्व के तेज मांग आ “नो, नट अगेन” के भावना । तीसर कारण: रास्वपा आ “बालेन क्रेज” के प्रभाव ।
पर्सा–१ के प्रदीप यादव कम समय में स्वास्थ्य, वन तथा वातावरण आ खानेपानी मंत्री बन चुकल बाड़ें, बाकिर बार-बार दल बदल आ सत्ता के सौदाबाजी मतदाता के पसंद ना आइल। जसपा के सचिव रहत मंत्री बनल आ चुनाव से ठीक पहिले एमाले में शामिल होखे के कदम के लोग अवसरवाद मानलस ।
क्षेत्र नं. ४ के रमेश रिजाल सात बेर चुनाव लड़ चुकल बाड़ें, जबकि क्षेत्र नं. २ के अजय चौरसिया दशकों से सत्ता के हिस्सा रहले। बावजूद एह सब के, बेरोजगारी, कृषि आ आधारभूत पूर्वाधार जइसन समस्या हल करे में ठोस पहल ना करे के आरोप मतदाता लगावत बाड़ें ।
२०२६ साल से राजनीति में सक्रिय रिजाल आ २०४८ से सक्रिय पूर्वमंत्री सुरेन्द्र चौधरी खातिर एह बेर “परिवर्तन” के नारा भारी पड़ गइल ।
काठमांडू से शुरू भइल वैकल्पिक राजनीति के लहर अब मधेस के गांव-गांव तक पहुंच गइल बा। रास्वपा के नया चेहरा, सुशासन के वादा आ काठमांडू के मेयर बालेन शाह के कार्यशैली से प्रभावित युवा पीढ़ी जात-धर्म से ऊपर उठ के बदलाव के पक्ष में मतदान कइले बिया।
पर्सा के एह नतीजा से मधेस केन्द्रित दल (जसपा, लोसपा) आ पुरान ठूला दल (कांग्रेस, एमाले) दुनो के गम्भीर आत्मसमीक्षा करे के संदेश मिलल बा । मतदाता अब पुरान त्याग आ जेल जीवन के कहानी ना, बल्कि वर्तमान में काम करे के क्षमता आ भविष्य के साफ योजना देखे चाहत बाड़ें ।
पर्सा में रास्वपा के क्लिन स्वीप खाली चुनावी जीत ना ह, बलुक मधेस के राजनीति में नया युग के शुरुआत के घंटी मानल जा रहल बा ।

